राफेल फाइटर जेट की बहुचर्चित डील में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है। भारत ने 114 नए राफेल विमानों की खरीद में अहम शर्तें जोड़ दी हैं, जिससे इस सौदे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सूत्रों के अनुसार, भारत चाहता है कि उसे इन जेट्स के लिए तकनीक का पूरा नियंत्रण मिले, जिसमें सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड भी शामिल हो। साथ ही, भारत इन विमानों के अधिकांश हिस्से स्वदेश में ही निर्मित करवाना चाहता है। डील के तहत 18 विमान फ्रांस में बनेंगे, जबकि 96 जेट्स की असेंबली भारत में की जाएगी।
राफेल डील में भारत की यह सख्त शर्तें फ्रांस के लिए नई चुनौती बन गई हैं। भारत का इरादा है कि राफेल जेट्स को स्वदेशी मिसाइल और उन्नत तकनीक से लैस किया जाए, ताकि वायुसेना की ताकत और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़े। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की डिफेंस इंडस्ट्री को बड़ा फायदा मिल सकता है।
दूसरी ओर, फ्रांस के सामने भी कई अंतरराष्ट्रीय दबाव हैं। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात ने राफेल F5 जेट्स की डील से खुद को अलग कर लिया है, वहीं जर्मनी के साथ छठी पीढ़ी के जेट प्रोजेक्ट को लेकर विवाद जारी है। ऐसे में फ्रांस के लिए भारत की यह डील और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर भारत और फ्रांस के बीच सहमति नहीं बनती है, तो 114 राफेल जेट्स का सौदा अधर में लटक सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील सिर्फ दो देशों के बीच का समझौता नहीं, बल्कि भारत की सैन्य नीति और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए भी निर्णायक साबित होगी।
फिलहाल दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत जारी है। भारत की कोशिश है कि इस बार की डील में उसे ज्यादा अधिकार और स्वदेशीकरण का मौका मिले। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि क्या भारत और फ्रांस एक नए समझौते पर पहुंच पाते हैं या यह डील और लंबी खिंचती है।
